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Thursday, 8 October 2015

चिंता – कामायनी

चिंता-सर्ग

कामायनी : जयशंकर प्रसाद


हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह |


नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन |

दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय समान,
नीरवता-सी शिला-चरण से टकराता फिरता पवमान |

तरूण तपस्वी-सा बैठा साधन करता सुर-स्मशान,
नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरूण अवसान।


उसी तपस्वी-से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े,
हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े।


अवयव की दृढ मांस-पेशियाँ, ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार,
स्फीत शिरायें, स्वस्थ रक्त का होता था जिनमें संचार।


चिंता-कातर वदन हो रहा पौरूष जिसमें ओत-प्रोत,
उधर उपेक्षामय यौवन का बहता भीतर मधुमय स्रोत।


बँधी महावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही,
उतर चला था वह जल-प्लावन,और निकलने लगी मही।


निकल रही थी मर्म वेदना करूणा विकल कहानी सी,
वहाँ अकेली प्रकृति सुन रही, हँसती-सी पहचानी-सी।

“ओ चिंता की पहली रेखा,अरी विश्व-वन की व्याली,
ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कंप-सी मतवाली।


हे अभाव की चपल बालिके,री ललाट की खलखेला
हरी-भरी-सी दौड़-धूप,ओ जल-माया की चल-रेखा।

इस ग्रहकक्षा की हलचल-री तरल गरल की लघु-लहरी,
जरा अमर-जीवन की,और न कुछ सुनने वाली, बहरी।

अरी व्याधि की सूत्र-धारिणी-अरी आधि, मधुमय अभिशाप
हृदय-गगन में धूमकेतु-सी,पुण्य-सृष्टि में सुंदर पाप।

मनन करावेगी तू कितना?उस निश्चित जाति का जीव
अमर मरेगा क्या?तू कितनी गहरी डाल रही है नींव।

आह घिरेगी हृदय-लहलहे खेतों पर करका-घन-सी,
छिपी रहेगी अंतरतम में सब के तू निगूढ धन-सी।

बुद्धि, मनीषा, मति, आशा,चिंता तेरे हैं कितने नाम
अरी पाप है तू, जा, चल जा यहाँ नहीं कुछ तेरा काम।

विस्मृति आ, अवसाद घेर ले,नीरवते बस चुप कर दे,
चेतनता चल जा, जड़ता से आज शून्य मेरा भर दे।”

“चिंता करता हूँ मैं जितनी उस अतीत की, उस सुख की,
उतनी ही अनंत में बनती जाती रेखायें दुख की।

आह सर्ग के अग्रदूत तुम असफल हुए, विलीन हुए,
भक्षक या रक्षक जो समझो, केवल अपने मीन हुए।

अरी आँधियों ओ बिजली की दिवा-रात्रि तेरा नतर्न,
उसी वासना की उपासना, वह तेरा प्रत्यावत्तर्न।

मणि-दीपों के अंधकारमय अरे निराशा पूर्ण भविष्य
देव-दंभ के महामेध में सब कुछ ही बन गया हविष्य।

अरे अमरता के चमकीले पुतलो तेरे ये जयनाद
काँप रहे हैं आज प्रतिध्वनि बन कर मानो दीन विषाद।

प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में,
भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के नद में।


वे सब डूबे, डूबा उनका विभव,बन गया पारावार
उमड़ रहा था देव-सुखों पर दुख-जलधि का नाद अपार।”

“वह उन्मुक्त विलास हुआ क्या स्वप्न रहा या छलना थी
देवसृष्टि की सुख-विभावरी ताराओं की कलना थी।

चलते थे सुरभित अंचल से जीवन के मधुमय निश्वास,
कोलाहल में मुखरित होता देव जाति का सुख-विश्वास।

सुख, केवल सुख का वह संग्रह,केंद्रीभूत हुआ इतना,
छायापथ में नव तुषार का सघन मिलन होता जितना।

सब कुछ थे स्वायत्त,विश्व के-बल,वैभव, आनंद अपार,
उद्वेलित लहरों-सा होता उस समृद्धि का सुख संचार।

कीर्ति, दीप्ती, शोभा थी नचती अरूण-किरण-सी चारों ओर,
सप्तसिंधु के तरल कणों में,द्रुम-दल में, आनन्द-विभोर।

शक्ति रही हाँ शक्ति-प्रकृति थी पद-तल में विनम्र विश्रांत,
कँपती धरणी उन चरणों से होकर प्रतिदिन ही आक्रांत।

स्वयं देव थे हम सब,तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि?
अरे अचानक हुई इसी से कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

गया, सभी कुछ गया,मधुर तम सुर-बालाओं का श्रृंगार,
ऊषा ज्योत्स्ना-सा यौवन-स्मित मधुप-सदृश निश्चित विहार।

भरी वासना-सरिता का वह कैसा था मदमत्त प्रवाह,
प्रलय-जलधि में संगम जिसका देख हृदय था उठा कराह।”

“चिर-किशोर-वय, नित्य विलासी सुरभित जिससे रहा दिगंत,
आज तिरोहित हुआ कहाँ वह मधु से पूर्ण अनंत वसंत?

कुसुमित कुंजों में वे पुलकित प्रेमालिंगन हुए विलीन,
मौन हुई हैं मूर्छित तानें और न सुन पडती अब बीन।

अब न कपोलों पर छाया-सी पडती मुख की सुरभित भाप
भुज-मूलों में शिथिल वसन की व्यस्त न होती है अब माप।

कंकण क्वणित, रणित नूपुर थे,हिलते थे छाती पर हार,
मुखरित था कलरव,गीतों में स्वर लय का होता अभिसार।

सौरभ से दिगंत पूरित था,अंतरिक्ष आलोक-अधीर,
सब में एक अचेतन गति थी,जिसमें पिछड़ा रहे समीर।

वह अनंग-पीड़ा-अनुभव-सा अंग-भंगियों का नत्तर्न,
मधुकर के मरंद-उत्सव-सा मदिर भाव से आवत्तर्न।

सुरा सुरभिमय बदन अरूण वे नयन भरे आलस अनुराग़,
कल कपोल था जहाँ बिछलता कल्पवृक्ष का पीत पराग।

विकल वासना के प्रतिनिधि वे सब मुरझाये चले गये,
आह जले अपनी ज्वाला से फिर वे जल में गले, गये।”

“अरी उपेक्षा-भरी अमरते री अतृप्ति निबार्ध विलास
द्विधा-रहित अपलक नयनों की भूख-भरी दर्शन की प्यास।

बिछुडे़ तेरे सब आलिंगन,पुलक-स्पर्श का पता नहीं,
मधुमय चुंबन कातरतायें,आज न मुख को सता रहीं।

रत्न-सौंध के वातायन, जिनमें आता मधु-मदिर समीर,
टकराती होगी अब उनमें तिमिंगिलों की भीड़ अधीर।

देवकामिनी के नयनों से जहाँ नील नलिनों की सृष्टि-
होती थी, अब वहाँ हो रही प्रलयकारिणी भीषण वृष्टि।

वे अम्लान-कुसुम-सुरभित-मणि रचित मनोहर मालायें,
बनीं श्रृंखला, जकड़ी जिनमें विलासिनी सुर-बालायें।

देव-यजन के पशुयज्ञों की वह पूर्णाहुति की ज्वाला,
जलनिधि में बन जलती कैसी आज लहरियों की माला।”

“उनको देख कौन रोया यों अंतरिक्ष में बैठ अधीर
व्यस्त बरसने लगा अश्रुमय यह प्रालेय हलाहल नीर।

हाहाकार हुआ क्रंदनमय कठिन कुलिश होते थे चूर,
हुए दिगंत बधिर, भीषण रव बार-बार होता था क्रूर।


दिग्दाहों से धूम उठे, या जलधर उठे क्षितिज-तट के
सघन गगन में भीम प्रकंपन, झंझा के चलते झटके।

अंधकार में मलिन मित्र की धुँधली आभा लीन हुई।
वरूण व्यस्त थे, घनी कालिमा स्तर-स्तर जमती पीन हुई,

पंचभूत का भैरव मिश्रण शंपाओं के शकल-निपात
उल्का लेकर अमर शक्तियाँ खोज़ रहीं ज्यों खोया प्रात।

बार-बार उस भीषण रव से कँपती धरती देख विशेष,
मानो नील व्योम उतरा हो आलिंगन के हेतु अशेष।

उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी,
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों-सी।

धसँती धरा, धधकती ज्वाला, ज्वाला-मुखियों के निस्वास
और संकुचित क्रमश: उसके अवयव का होता था ह्रास।

सबल तरंगाघातों से उस क्रुद्ध सिंद्धु के, विचलित-सी-
व्यस्त महाकच्छप-सी धरणी ऊभ-चूम थी विकलित-सी।

बढ़ने लगा विलास-वेग सा वह अतिभैरव जल-संघात,
तरल-तिमिर से प्रलय-पवन का होता आलिंगन प्रतिघात।

वेला क्षण-क्षण निकट आ रही क्षितिज क्षीण, फिर लीन हुआ
उदधि डुबाकर अखिल धरा को बस मर्यादा-हीन हुआ।

करका क्रंदन करती और कुचलना था सब का,
पंचभूत का यह तांडवमय नृत्य हो रहा था कब का।”

“एक नाव थी, और न उसमें डाँडे लगते, या पतवार,
तरल तरंगों में उठ-गिरकर बहती पगली बारंबार।

लगते प्रबल थपेडे़, धुँधले तट का था कुछ पता नहीं,
कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं।

लहरें व्योम चूमती उठतीं,चपलायें असंख्य नचतीं,
गरल जलद की खड़ी झड़ी में बूँदे निज संसृति रचतीं।

चपलायें उस जलधि-विश्व में स्वयं चमत्कृत होती थीं।
ज्यों विराट बाड़व-ज्वालायें खंड-खंड हो रोती थीं।

जलनिधि के तलवासी जलचर विकल निकलते उतराते,
हुआ विलोड़ित गृह, तब प्राणी कौन! कहाँ! कब सुख पाते?

घनीभूत हो उठे पवन, फिर श्वासों की गति होती रूद्ध,
और चेतना थी बिलखाती,दृष्टि विफल होती थी क्रुद्ध।

उस विराट आलोड़न में ग्रह,तारा बुद-बुद से लगते,
प्रखर-प्रलय पावस में जगमग़,ज्योतिर्गणों-से जगते।

प्रहर दिवस कितने बीते,अब इसको कौन बता सकता,
इनके सूचक उपकरणों का चिह्न न कोई पा सकता।

काला शासन-चक्र मृत्यु का कब तक चला, न स्मरण रहा,
महामत्स्य का एक चपेटा दीन पोत का मरण रहा।

किंतु उसी ने ला टकराया इस उत्तरगिरि के शिर से,
देव-सृष्टि का ध्वंस अचानक श्वास लगा लेने फिर से।

आज अमरता का जीवित हूँ मैं वह भीषण जर्जर दंभ,
आह सर्ग के प्रथम अंक का अधम-पात्र मय सा विष्कंभ!”

“ओ जीवन की मरू-मरिचिका, कायरता के अलस विषाद!
अरे पुरातन अमृत अगतिमय मोहमुग्ध जर्जर अवसाद!

मौन नाश विध्वंस अँधेरा शून्य बना जो प्रकट अभाव,
वही सत्य है, अरी अमरते तुझको यहाँ कहाँ अब ठाँव।

मृत्यु, अरी चिर-निद्रे तेरा अंक हिमानी-सा शीतल,
तू अनंत में लहर बनाती काल-जलधि की-सी हलचल।

महानृत्य का विषम सम अरी अखिल स्पंदनों की तू माप,
तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप।
अंधकार के अट्टहास-सी मुखरित सतत चिरंतन सत्य,
छिपी सृष्टि के कण-कण में तू यह सुंदर रहस्य है नित्य।

जीवन तेरा क्षुद्र अंश है व्यक्त नील घन-माला में,
सौदामिनी-संधि-सा सुन्दर क्षण भर रहा उजाला में।”

पवन पी रहा था शब्दों को निर्जनता की उखड़ी साँस,
टकराती थी, दीन प्रतिध्वनि बनी हिम-शिलाओं के पास।
धू-धू करता नाच रहा था अनस्तित्व का तांडव नृत्य,
आकर्षण-विहीन विद्युत्कण बने भारवाही थे भृत्य।

मृत्यु सदृश शीतल निराश ही आलिंगन पाती थी दृष्टि,
परमव्योम से भौतिक कण-सी घने कुहासों की थी वृष्टि।

वाष्प बना उड़ता जाता था या वह भीषण जल-संघात,
सौरचक्र में आवतर्न था प्रलय निशा का होता प्रात।
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श्रद्धा – कामायनी



जयशंकर प्रसाद

कौन हो तुम? संसृति-जलनिधितीर-तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक?
मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य”
सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी का-सा जब सानंद,
किये मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद,
एक झटका-सा लगा सहर्ष, निरखने लगे लुटे-से| कौन
गा रहा यह सुंदर संगीत? कुतुहल रह न सका फिर मौन।

और देखा वह सुंदर दृश्य नयन का इद्रंजाल अभिराम,
कुसुम-वैभव में लता समान चंद्रिका से लिपटा घनश्याम।
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार एक लम्बी काया, उन्मुक्त
मधु-पवन क्रीडित ज्यों शिशु साल, सुशोभित हो सौरभ-संयुक्त।
मसृण, गांधार देश के नील रोम वाले मेषों के चर्म,
ढक रहे थे उसका वपु कांत बन रहा था वह कोमल वर्म।
नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,
खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघवन बीच गुलाबी रंग।

आह वह मुख पश्विम के व्योम बीच जब घिरते हों घन श्याम,
अरूण रवि-मंडल उनको भेद दिखाई देता हो छविधाम।
या कि, नव इंद्रनील लघु श्रृंग फोड़ कर धधक रही हो कांत
एक ज्वालामुखी अचेत माधवी रजनी में अश्रांत।
घिर रहे थे घुँघराले बाल अंस अवलंबित मुख के पास,
नील घनशावक-से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास।
और, उस पर वह मुसक्यान रक्त किसलय पर ले विश्राम
अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम।

नित्य-यौवन छवि से ही दीप्त विश्व की करूण कामना मूर्ति,
स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति।
ऊषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भीगी भर मोद,
मद भरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद
कुसुम कानन अंचल में मंद-पवन प्रेरित सौरभ साकार,
रचित, परमाणु-पराग-शरीर खड़ा हो, ले मधु का आधार।
और, पडती हो उस पर शुभ्र नवल मधु-राका मन की साध,
हँसी का मदविह्वल प्रतिबिंब मधुरिमा खेला सदृश अबाध।

कहा मनु ने-“नभ धरणी बीच बना जीचन रहस्य निरूपाय,
एक उल्का सा जलता भ्रांत, शून्य में फिरता हूँ असहाय।
शैल निर्झर न बना हतभाग्य, गल नहीं सका जो कि हिम-खंड,
दौड़ कर मिला न जलनिधि-अंक आह वैसा ही हूँ पाषंड।
पहेली-सा जीवन है व्यस्त, उसे सुलझाने का अभिमान
बताता है विस्मृति का मार्ग चल रहा हूँ बनकर अनज़ान।
भूलता ही जाता दिन-रात सजल अभिलाषा कलित अतीत,
बढ़ रहा तिमिर-गर्भ में नित्य जीवन का यह संगीत।

क्या कहूँ, क्या हूँ मैं उद्भ्रांत? विवर में नील गगन के आज
वायु की भटकी एक तरंग, शून्यता का उज़ड़ा-सा राज़।
एक स्मृति का स्तूप अचेत, ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब
और जड़ता की जीवन-राशि, सफलता का संकलित विलंब।”
“कौन हो तुम बंसत के दूत विरस पतझड़ में अति सुकुमार।
घन-तिमिर में चपला की रेख तपन में शीतल मंद बयार।
नखत की आशा-किरण समान हृदय के कोमल कवि की कांत-
कल्पना की लघु लहरी दिव्य कर रही मानस-हलचल शांत”।

लगा कहने आगंतुक व्यक्ति मिटाता उत्कंठा सविशेष,
दे रहा हो कोकिल सानंद सुमन को ज्यों मधुमय संदेश।
“भरा था मन में नव उत्साह सीख लूँ ललित कला का ज्ञान,
इधर रही गन्धर्वों के देश, पिता की हूँ प्यारी संतान।
घूमने का मेरा अभ्यास बढ़ा था मुक्त-व्योम-तल नित्य,
कुतूहल खोज़ रहा था, व्यस्त हृदय-सत्ता का सुंदर सत्य।

दृष्टि जब जाती हिमगिरी ओर प्रश्न करता मन अधिक अधीर,
धरा की यह सिकुडन भयभीत आह, कैसी है? क्या है? पीर?
मधुरिमा में अपनी ही मौन एक सोया संदेश महान,
सज़ग हो करता था संकेत, चेतना मचल उठी अनजान।
बढ़ा मन और चले ये पैर, शैल-मालाओं का श्रृंगार,
आँख की भूख मिटी यह देख आह कितना सुंदर संभार।

एक दिन सहसा सिंधु अपार लगा टकराने नद तल क्षुब्ध,
अकेला यह जीवन निरूपाय आज़ तक घूम रहा विश्रब्ध।
यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न, भूत-हित-रत किसका यह दान
इधर कोई है अभी सजीव, हुआ ऐसा मन में अनुमान।
तपस्वी क्यों हो इतने क्लांत?वेदना का यह कैसा वेग?
आह!तुम कितने अधिक हताश- बताओ यह कैसा उद्वेग?
हृदय में क्या है नहीं अधीर- लालसा की निश्शेष?

कर रहा वंचित कहीं न त्याग तुम्हें, मन में घर सुंदर वेश
दुख के डर से तुम अज्ञात जटिलताओं का कर अनुमान,
काम से झिझक रहे हो आज़ भविष्य से बनकर अनजान,
कर रही लीलामय आनंद- महाचिति सजग हुई-सी व्यक्त,
विश्व का उन्मीलन अभिराम- इसी में सब होते अनुरक्त।

काम-मंगल से मंडित श्रेय, सर्ग इच्छा का है परिणाम,
तिरस्कृत कर उसको तुम भूल बनाते हो असफल भवधाम”
“दुःख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात,
एक परदा यह झीना नील छिपाये है जिसमें सुख गात।
जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल-
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।

विषमता की पीडा से व्यक्त हो रहा स्पंदित विश्व महान,
यही दुख-सुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान।
नित्य समरसता का अधिकार उमडता कारण-जलधि समान,
व्यथा से नीली लहरों बीच बिखरते सुख-मणिगण-द्युतिमान।”
लगे कहने मनु सहित विषाद- “मधुर मारूत-से ये उच्छ्वास
अधिक उत्साह तरंग अबाध उठाते मानस में सविलास।

किंतु जीवन कितना निरूपाय! लिया है देख, नहीं संदेह,
निराशा है जिसका कारण, सफलता का वह कल्पित गेह।”
कहा आगंतुक ने सस्नेह- “अरे, तुम इतने हुए अधीर
हार बैठे जीवन का दाँव, जीतते मर कर जिसको वीर।
तप नहीं केवल जीवन-सत्य करूण यह क्षणिक दीन अवसाद,
तरल आकांक्षा से है भरा- सो रहा आशा का आल्हाद।

प्रकृति के यौवन का श्रृंगार करेंगे कभी न बासी फूल,
मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र आह उत्सुक है उनकी धूल।
पुरातनता का यह निर्मोक सहन करती न प्रकृति पल एक,
नित्य नूतनता का आंनद किये है परिवर्तन में टेक।
युगों की चट्टानों पर सृष्टि डाल पद-चिह्न चली गंभीर,
देव,गंधर्व,असुर की पंक्ति अनुसरण करती उसे अधीर।”
“एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड प्रकृति वैभव से भरा अमंद,
कर्म का भोग, भोग का कर्म, यही जड़ का चेतन-आनन्द।

अकेले तुम कैसे असहाय यजन कर सकते? तुच्छ विचार।
तपस्वी! आकर्षण से हीन कर सके नहीं आत्म-विस्तार।
दब रहे हो अपने ही बोझ खोजते भी नहीं कहीं अवलंब,
तुम्हारा सहचर बन कर क्या न उऋण होऊँ मैं बिना विलंब?
समर्पण लो-सेवा का सार, सजल संसृति का यह पतवार,
आज से यह जीवन उत्सर्ग इसी पद-तल में विगत-विकार
दया, माया, ममता लो आज, मधुरिमा लो, अगाध विश्वास,
हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास।

बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,
विश्व-भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।”
“और यह क्या तुम सुनते नहीं विधाता का मंगल वरदान-
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो’ विश्व में गूँज रहा जय-गान।
डरो मत, अरे अमृत संतान अग्रसर है मंगलमय वृद्धि,
पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र खिंची आवेगी सकल समृद्धि।

देव-असफलताओं का ध्वंस प्रचुर उपकरण जुटाकर आज,
पड़ा है बन मानव-सम्पत्ति पूर्ण हो मन का चेतन-राज।
चेतना का सुंदर इतिहास- अखिल मानव भावों का सत्य,
विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य अक्षरों से अंकित हो नित्य।
विधाता की कल्याणी सृष्टि, सफल हो इस भूतल पर पूर्ण,
पटें सागर, बिखरे ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।

उन्हें चिंगारी सदृश सदर्प कुचलती रहे खडी सानंद,
आज से मानवता की कीर्ति अनिल, भू, जल में रहे न बंद।
जलधि के फूटें कितने उत्स- द्वीफ-कच्छप डूबें-उतरायें।
किन्तु वह खड़ी रहे दृढ-मूर्ति अभ्युदय का कर रही उपाय।
विश्व की दुर्बलता बल बने, पराजय का बढ़ता व्यापार-
हँसाता रहे उसे सविलास शक्ति का क्रीडामय संचार।

शक्ति के विद्युत्कण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो निरूपाय,
समन्वय उसका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय”।
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लज्जा-कामायनी


जयशंकर प्रसाद


“कोमल किसलय के अंचल में

नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी,

गोधूली के धूमिल पट में

दीपक के स्वर में दिपती-सी।
मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में

मन का उन्माद निखरता ज्यों-

सुरभित लहरों की छाया में

बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों-
वैसी ही माया में लिपटी

अधरों पर उँगली धरे हुए,

माधव के सरस कुतूहल का

आँखों में पानी भरे हुए।
नीरव निशीथ में लतिका-सी

तुम कौन आ रही हो बढ़ती?

कोमल बाँहे फैलाये-सी

आलिगंन का जादू पढ़ती?
किन इंद्रजाल के फूलों से

लेकर सुहाग-कण-राग-भरे,

सिर नीचा कर हो गूँथ माला

जिससे मधु धार ढरे?
पुलकित कदंब की माला-सी

पहना देती हो अंतर में,

झुक जाती है मन की डाली

अपनी फल भरता के डर में।
वरदान सदृश हो डाल रही

नीली किरणों से बुना हुआ,

यह अंचल कितना हलका-सा

कितना सौरभ से सना हुआ।
सब अंग मोम से बनते हैं

कोमलता में बल खाती हूँ,

मैं सिमिट रही-सी अपने में

परिहास-गीत सुन पाती हूँ।
स्मित बन जाती है तरल हँसी

नयनों में भरकर बाँकपना,

प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो

वह बनता जाता है सपना।
मेरे सपनों में कलरव का संसार

आँख जब खोल रहा,

अनुराग समीरों पर तिरता था

इतराता-सा डोल रहा।
अभिलाषा अपने यौवन में

उठती उस सुख के स्वागत को,

जीवन भर के बल-वैभव से

सत्कृत करती दूरागत को।
किरणों का रज्जु समेट लिया

जिसका अवलंबन ले चढ़ती,

रस के निर्झर में धँस कर मैं

आनन्द-शिखर के प्रति बढ़ती।
छूने में हिचक, देखने में

पलकें आँखों पर झुकती हैं,

कलरव परिहास भरी गूजें

अधरों तक सहसा रूकती हैं।
संकेत कर रही रोमाली

चुपचाप बरजती खड़ी रही,

भाषा बन भौंहों की काली-रेखा-सी

भ्रम में पड़ी रही।
तुम कौन! हृदय की परवशता?

सारी स्वतंत्रता छीन रही,

स्वच्छंद सुमन जो खिले रहे

जीवन-वन से हो बीन रही”
संध्या की लाली में हँसती,

उसका ही आश्रय लेती-सी,

छाया प्रतिमा गुनगुना उठी

श्रद्धा का उत्तर देती-सी।
“इतना न चमत्कृत हो बाले

अपने मन का उपकार करो,

मैं एक पकड़ हूँ जो कहती

ठहरो कुछ सोच-विचार करो।
अंबर-चुंबी हिम-श्रंगों से

कलरव कोलाहल साथ लिये,

विद्युत की प्राणमयी धारा

बहती जिसमें उन्माद लिये।
मंगल कुंकुम की श्री जिसमें

निखरी हो ऊषा की लाली,

भोला सुहाग इठलाता हो

ऐसी हो जिसमें हरियाली।
हो नयनों का कल्याण बना

आनन्द सुमन सा विकसा हो,

वासंती के वन-वैभव में

जिसका पंचम स्वर पिक-सा हो,
जो गूँज उठे फिर नस-नस में

मूर्छना समान मचलता-सा,

आँखों के साँचे में आकर

रमणीय रूप बन ढलता-सा,
नयनों की नीलम की घाटी

जिस रस घन से छा जाती हो,

वह कौंध कि जिससे अंतर की

शीतलता ठंडक पाती हो,
हिल्लोल भरा हो ऋतुपति का

गोधूली की सी ममता हो,

जागरण प्रात-सा हँसता हो

जिसमें मध्याह्न निखरता हो,
हो चकित निकल आई

सहसा जो अपने प्राची के घर से,

उस नवल चंद्रिका-से बिछले जो

मानस की लहरों पर-से, 

फूलों की कोमल पंखुडियाँ

बिखरें जिसके अभिनंदन में,

मकरंद मिलाती हों अपना

स्वागत के कुंकुम चंदन में,
कोमल किसलय मर्मर-रव-से

जिसका जयघोष सुनाते हों,

जिसमें दुख-सुख मिलकर

मन के उत्सव आनंद मनाते हों,
उज्ज्वल वरदान चेतना का

सौंदर्य जिसे सब कहते हैं।

जिसमें अनंत अभिलाषा के

सपने सब जगते रहते हैं।
मैं उसी चपल की धात्री हूँ,

गौरव महिमा हूँ सिखलाती,

ठोकर जो लगने वाली है

उसको धीरे से समझाती,
मैं देव-सृष्टि की रति-रानी

निज पंचबाण से वंचित हो,

बन आवर्जना-मूर्त्ति दीना

अपनी अतृप्ति-सी संचित हो,
अवशिष्ट रह गई अनुभव में

अपनी अतीत असफलता-सी,

लीला विलास की खेद-भरी

अवसादमयी श्रम-दलिता-सी,
मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ

मैं शालीनता सिखाती हूँ,

मतवाली सुंदरता पग में

नूपुर सी लिपट मनाती हूँ,
लाली बन सरल कपोलों में

आँखों में अंजन सी लगती,

कुंचित अलकों सी घुंघराली

मन की मरोर बनकर जगती,
चंचल किशोर सुंदरता की मैं

करती रहती रखवाली,

मैं वह हलकी सी मसलन हूँ

जो बनती कानों की लाली।”
“हाँ, ठीक, परंतु बताओगी

मेरे जीवन का पथ क्या है?

इस निविड़ निशा में संसृति की

आलोकमयी रेखा क्या है?
यह आज समझ तो पाई हूँ

मैं दुर्बलता में नारी हूँ,

अवयव की सुंदर कोमलता

लेकर मैं सबसे हारी हूँ।
पर मन भी क्यों इतना ढीला

अपना ही होता जाता है,

घनश्याम-खंड-सी आँखों में क्यों

सहसा जल भर आता है?
सर्वस्व-समर्पण करने की

विश्वास-महा-तरू-छाया में,

चुपचाप पड़ी रहने की क्यों

ममता जगती है माया में?
छायापथ में तारक-द्युति सी

झिलमिल करने की मधु-लीला,

अभिनय करती क्यों इस मन में

कोमल निरीहता श्रम-शीला?
निस्संबल होकर तिरती हूँ

इस मानस की गहराई में,

चाहती नहीं जागरण कभी

सपने की इस सुधराई में।
नारी जीवन का चित्र यही क्या?

विकल रंग भर देती हो,

अस्फुट रेखा की सीमा में

आकार कला को देती हो।
रूकती हूँ और ठहरती हूँ

पर सोच-विचार न कर सकती,

पगली सी कोई अंतर में

बैठी जैसे अनुदिन बकती।
मैं जब भी तोलने का करती

उपचार स्वयं तुल जाती हूँ

भुजलता फँसा कर नर-तरू से

झूले सी झोंके खाती हूँ।
इस अर्पण में कुछ और नहीं

केवल उत्सर्ग छलकता है,

मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूँ,

इतना ही सरल झलकता है।”
” क्या कहती हो ठहरो नारी!

संकल्प अश्रु-जल-से-अपने-

तुम दान कर चुकी पहले ही

जीवन के सोने-से सपने।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो

विश्वास-रजत-नग पगतल में,

पीयूष-स्रोत-सी बहा करो

जीवन के सुंदर समतल में।
देवों की विजय, दानवों की

हारों का होता-युद्ध रहा,

संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित

रह नित्य-विरूद्ध रहा।
आँसू से भींगे अंचल पर मन का

सब कुछ रखना होगा-

तुमको अपनी स्मित रेखा से

यह संधिपत्र लिखना होगा।
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ब्रह्मराक्षस

गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खँडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अँधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की…
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में…
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।बावड़ी को घेर
डालें खूब उलझी हैं,
खड़े हैं मौन औदुम्बर।
व शाखों पर
लटकते घुग्घुओं के घोंसले परित्यक्त भूरे गोल।
विद्युत शत पुण्यों का आभास
जंगली हरी कच्ची गंध में बसकर
हवा में तैर
बनता है गहन संदेह
अनजानी किसी बीती हुई उस श्रेष्ठता का जो कि
दिल में एक खटके सी लगी रहती।बावड़ी की इन मुँडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक
बैठी है टगर
ले पुष्प तारे-श्वेत



उसके पास
लाल फूलों का लहकता झौंर–
मेरी वह कन्हेर…
वह बुलाती एक खतरे की तरफ जिस ओर
अँधियारा खुला मुँह बावड़ी का
शून्य अम्बर ताकता है।

बावड़ी की उन गहराइयों में शून्य
ब्रह्मराक्षस एक पैठा है,
व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज,
हड़बड़ाहट शब्द पागल से।
गहन अनुमानिता
तन की मलिनता
दूर करने के लिए प्रतिपल
पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात
स्वच्छ करने–
ब्रह्मराक्षस
घिस रहा है देह
हाथ के पंजे बराबर,
बाँह-छाती-मुँह छपाछप
खूब करते साफ़,
फिर भी मैल
फिर भी मैल!!

और… होठों से
अनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार,
अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार,
मस्तक की लकीरें
बुन रहीं
आलोचनाओं के चमकते तार!!
उस अखण्ड स्नान का पागल प्रवाह….
प्राण में संवेदना है स्याह!!

किन्तु, गहरी बावड़ी
की भीतरी दीवार पर
तिरछी गिरी रवि-रश्मि
के उड़ते हुए परमाणु, जब
तल तक पहुँचते हैं कभी
तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने
झुककर नमस्ते कर दिया।

पथ भूलकर जब चाँदनी
की किरन टकराये
कहीं दीवार पर,
तब ब्रह्मराक्षस समझता है
वन्दना की चाँदनी ने
ज्ञान गुरू माना उसे।

अति प्रफुल्लित कण्टकित तन-मन वही
करता रहा अनुभव कि नभ ने भी
विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी!!

और तब दुगुने भयानक ओज से
पहचान वाला मन
सुमेरी-बेबिलोनी जन-कथाओं से
मधुर वैदिक ऋचाओं तक
व तब से आज तक के सूत्र छन्दस्, मन्त्र, थियोरम,
सब प्रेमियों तक
कि मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, टॉएन्बी
कि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गाँधी भी
सभी के सिद्ध-अंतों का
नया व्याख्यान करता वह
नहाता ब्रह्मराक्षस, श्याम
प्राक्तन बावड़ी की
उन घनी गहराईयों में शून्य।

……ये गरजती, गूँजती, आन्दोलिता
गहराईयों से उठ रही ध्वनियाँ, अतः
उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में
हर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता,
वह रूप अपने बिम्ब से भी जूझ
विकृताकार-कृति
है बन रहा
ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ

बावड़ी की इन मँडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक सुनते हैं
टगर के पुष्प-तारे श्वेत

वे ध्वनियाँ!

सुनते हैं करोंदों के सुकोमल फूल
सुनता है उन्हे प्राचीन ओदुम्बर
सुन रहा हूँ मैं वही पागल प्रतीकों में कही जाती हुई
वह ट्रेजिडी
जो बावड़ी में अड़ गयी।खूब ऊँचा एक जीना साँवला



उसकी अँधेरी सीढ़ीयाँ…

वे एक आभ्यंतर निराले लोक की।
एक चढ़ना औ’ उतरना,
पुनः चढ़ना औ’ लुढ़कना,
मोच पैरों में
व छाती पर अनेकों घाव।
बुरे-अच्छे-बीच का संघर्ष

वे भी उग्रतर

अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर
गहन किंचित सफलता,
अति भव्य असफलता
…अतिरेकवादी पूर्णता

की व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं…

ज्यामितिक संगति-गणित
की दृष्टि के कृत

भव्य नैतिक मान

आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक मान…
…अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना

कब रहा आसान

मानवी अंतर्कथाएँ बहुत प्यारी हैं!!

रवि निकलता
लाल चिन्ता की रुधिर-सरिता
प्रवाहित कर दीवारों पर,
उदित होता चन्द्र
व्रण पर बाँध देता
श्वेत-धौली पट्टियां
उद्विग्न भालों पर
सितारे आसमानी छोर पर फैले हुए
अनगिन दशमलव से
दशमलव-बिन्दुओं के सर्वतः
पसरे हुए उलझे गणित मैदान में
मारा गया, वह काम आया,
और वह पसरा पड़ा है…
वक्ष-बाँहें खुली फैलीं
एक शोधक की।

व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक प्रासाद सा,
प्रासाद में जीना
व जीने की अकेली सीढ़ीयाँ
चढ़ना बहुत मुश्किल रहा।
वे भाव-संगत तर्क-संगत
कार्य सामंजस्य-योजित
समीकरणों के गणित की सीढ़ियाँ
हम छोड़ दें उसके लिए।
उस भाव तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन-
शोध में
सब पण्डितों, सब चिन्तकों के पास
वह गुरू प्राप्त करने के लिए
भटका!!

किन्तु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी
…लाभकारी कार्य में से धन,
व धन में से हृदय-मन,
और, धन-अभिभूत अन्तःकरण में से
सत्य की झाईं

निरन्तर चिलचिलाती थी।

आत्मचेतस् किन्तु इस
व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन…
विश्वचेतस् बे-बनाव!!
महत्ता के चरण में था
विषादाकुल मन!
मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि
तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर
बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य
उसकी महत्ता!
व उस महत्ता का
हम सरीखों के लिए उपयोग,
उस आन्तरिकता का बताता मैं महत्व!!

पिस गया वह भीतरी
औ’ बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!

बावड़ी में वह स्वयं
पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा
वह कोठरी में किस तरह
अपना गणित करता रहा
औ’ मर गया…
वह सघन झाड़ी के कँटीले
तम-विवर में
मरे पक्षी-सा
विदा ही हो गया
वह ज्योति अनजानी सदा को सो गयी
यह क्यों हुआ!
क्यों यह हुआ!!
मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य
होना चाहता
जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,
उसकी वेदना का स्रोत
संगत पूर्ण निष्कर्षों तलक
पहुँचा सकूँ।
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कुरुक्षेत्र

रामधारी सिंह “दिनकर”

प्रथम सर्ग

वह कौन रोता है वहाँ-इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं, कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता, शोनित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?
और तब सम्मान से जाते गिने नाम उनके, देश-मुख की लालिमा
है बची जिनके लुटे सिन्दूर से; देश की इज्जत बचाने के लिए
या चढा जिनने दिये निज लाल हैं।
ईश जानें, देश का लज्जा विषय तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी।
विश्व-मानव के हृदय निर्द्वेष में
मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का;
चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,
फैलतीं लपटें विषैली व्यक्तियों की साँस से।
हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!
लड़ना उसे पड़ता मगर।
औ’ जीतने के बाद भी,
रणभूमि में वह देखता है सत्य को रोता हुआ;
वह सत्य, है जो रो रहा इतिहास के अध्याय में
विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता।
उस सत्य के आघात से
हैं झनझना उठ्ती शिराएँ प्राण की असहाय-सी,
सहसा विपंचि लगे कोई अपरिचित हाथ ज्यों।
वह तिलमिला उठता, मगर,
है जानता इस चोट का उत्तर न उसके पास है।
सहसा हृदय को तोड़कर
कढती प्रतिध्वनि प्राणगत अनिवार सत्याघात की-
‘नर का बहाया रक्त, हे भगवान! मैंने क्या किया
लेकिन, मनुज के प्राण, शायद, पत्थरों के हैं बने।
इस दंश क दुख भूल कर होता समर-आरूढ फिर;
फिर मारता, मरता, विजय पाकर बहाता अश्रु है।
यों ही, बहुत पहले कभी कुरुभूमि में
नर-मेध की लीला हुई जब पूर्ण थी,
पीकर लहू जब आदमी के वक्ष का
वज्रांग पाण्डव भीम क मन हो चुका परिशान्त था।
और जब व्रत-मुक्त-केशी द्रौपदी,
मानवी अथवा ज्वलित, जाग्रत शिखा प्रतिशोध की
दाँत अपने पीस अन्तिम क्रोध से,
रक्त-वेणी कर चुकी थी केश की,
केश जो तेरह बरस से थे खुले।
और जब पविकाय पाण्डव भीम ने द्रोण-सुत के सीस की मणि छीन कर
हाथ में रख दी प्रिया के मग्न हो पाँच नन्हें बालकों के मुल्य-सी।
कौरवों का श्राद्ध करने के लिए या कि रोने को चिता के सामने,
शेष जब था रह गया कोई नहीं एक वृद्धा, एक अन्धे के सिवा।
और जब,
तीव्र हर्ष-निनाद उठ कर पाण्डवों के शिविर से
घूमता फिरता गहन कुरुक्षेत्र की मृतभूमि में,
लड़खड़ाता-सा हवा पर एक स्वर निस्सार-सा,
लौट आता था भटक कर पाण्डवों के पास ही,
जीवितों के कान पर मरता हुआ,
और उन पर व्यंग-सा करता हुआ-
‘देख लो, बाहर महा सुनसान है
सालता जिनका हृदय मैं, लोग वे सब जा चुके।’
हर्ष के स्वर में छिपा जो व्यंग है,
कौन सुन समझे उसे? सब लोग तो
अर्द्ध-मृत-से हो रहे आनन्द से;
जय-सुरा की सनसनी से चेतना निस्पन्द है।
किन्तु, इस उल्लास-जड़ समुदाय मेंएक ऐसा भी पुरुष है, हो विकल
बोलता कुछ भी नहीं, पर, रो रहामग्न चिन्तालीन अपने-आप में।
“सत्य ही तो, जा चुके सब लोग हैं दूर ईष्या-द्वेष, हाहाकार से!
मर गये जो, वे नहीं सुनते इसे; हर्ष क स्वर जीवितों का व्यंग है।”
स्वप्न-सा देखा, सुयोधन कह रहा-“ओ युधिष्ठिर, सिन्धु के हम पार हैं;
तुम चिढाने के लिए जो कुछ कहो,किन्तु, कोई बात हम सुनते नहीं।
“हम वहाँ पर हैं, महाभारत जहाँ दीखता है स्वप्न अन्तःशून्य-सा,
जो घटित-सा तो कभी लगता, मगर,अर्थ जिस्क अब न कोई याद है।
“आ गये हम पार, तुम उस पार हो;यह पराजय कि जय किसकी हुई?
व्यंग, पश्चाताप, अन्तर्दाह का अब विजय-उपहार भोगो चैन से।”
हर्ष का स्वर घूमता निस्सार-सा लड़खड़ाता मर रहा कुरुक्षेत्र में,
औ’ युधिष्ठिर सुन रहे अव्यक्त-सा एक रव मन का कि व्यापक शून्य का।
‘रक्त से सिंच कर समर की मेदिनी हो गयी है लाल नीचे कोस-भर,
और ऊपर रक्त की खर धार में तैरते हैं अंग रथ, गज, बाजि के।
‘किन्तु, इस विध्वंस के उपरान्त भी शेष क्या है? व्यंग ही तो भग्य का?
चाहता था प्राप्त करना जिसे तत्व वह करगत हुआ या उड़ गया?
‘सत्य ही तो, मुष्टिगत करना जिसे चाहता ठा, शत्रुओं के साथ ही
उड़ गये वे तत्त्व, मेरे हाथ में व्यंग, पश्चाताप केवल छोड़कर।
‘यह महाभारत वृथा, निष्फल हुआ,
उफ! ज्वलित कितना गरलमय व्यंग है?
पाँच ही असहिष्णु नर के द्वेष से
हो गया संहार पूरे देश का!
‘द्रौपदी हो दिव्य-वस्त्रालंकृता, और हम भोगें अहम्मय राज्य यह,
पुत्र-पति-हीना इसी से तो हुईं कोटि माताएँ, करोड़ों नारियाँ!
‘रक्त से छाने हुए इस राज्य को वज्र-सा कुछ टूटकर स्मृति से गिरा,
दब गयी वह बुद्धि जो अबतक रही खोजती कुछ तत्त्वरण के भस्म में।
भर गया ऐसा हृदय दुख-दर्द-से, फेन य बुदबुद नहीं उसमें उठा!
खींचकर उच्छ्वास बोले सिर्फ वे‘पार्थ, मैं जाता पितामह पास हूँ।’
और हर्ष-निनाद अन्तःशून्य-सालड़खड़ता मर रहा था वायु में।





द्वितीय सर्ग
आयी हुई मृत्यु से कहा अजेय भीष्म ने कि
‘योग नहीं जाने का अभी है, इसे जानकर,
रुकी रहो पास कहीं’; और स्वयं लेट गये
बाणों का शयन, बाण का ही उपधान कर!
व्यास कहते हैं, रहे यों ही वे पड़े विमुक्त,
काल के करों से छीन मुष्टि-गत प्राण कर।
और पंथ जोहती विनीत कहीं आसपास
हाथ जोड़ मृत्यु रही खड़ी शास्ति मान कर।
श्रृंग चढ जीवन के आर-पार हेरते-से
योगलीन लेटे थे पितामह गंभीर-से।
देखा धर्मराज ने, विभा प्रसन्न फैल रही
श्वेत शिरोरुह, शर-ग्रथित शरीर-से।
करते प्रणाम, छूते सिर से पवित्र पद,
उँगली को धोते हुए लोचनों के नीर से,
“हाय पितामह, महाभारत विफल हुआ”
चीख उठे धर्मराज व्याकुल, अधीर-से।
“वीर-गति पाकर सुयोधन चला गया है,
छोड़ मेरे सामने अशेष ध्वंस का प्रसार;
छोड़ मेरे हाथ में शरीर निज प्राणहीन,
व्योम में बजाता जय-दुन्दुभि-सा बार-बार;
और यह मृतक शरीर जो बचा है शेष,
चुप-चुप, मानो, पूछता है मुझसे पुकार-
विजय का एक उपहार मैं बचा हूँ, बोलो,
जीत किसकी है और किसकी हुई है हार?
“हाय, पितामह, हार किसकी हुई है यह?
ध्वन्स-अवशेष पर सिर धुनता है कौन?
कौन भस्नराशि में विफल सुख ढूँढता है?
लपटों से मुकुट क पट बुनता है कौन?
और बैठ मानव की रक्त-सरिता के तीर
नियति के व्यंग-भरे अर्थ गुनता है कौन?
कौन देखता है शवदाह बन्धु-बान्धवों का?
उत्तरा का करुण विलाप सुनता है कौन?
“जानता कहीं जो परिणाम महाभारत का,
तन-बल छोड़ मैं मनोबल से लड़ता;
तप से, सहिष्णुता से, त्याग से सुयोधन को
जीत, नयी नींव इतिहास कि मैं धरता।
और कहीं वज्र गलता न मेरी आह से जो,
मेरे तप से नहीं सुयोधन सुधरता;
तो भी हाय, यह रक्त-पात नहीं करता मैं,
भाइयों के संग कहीं भीख माँग मरता।
“किन्तु, हाय, जिस दिन बोया गया युद्ध-बीज,
साथ दिया मेर नहीं मेरे दिव्य ज्ञान ने;
उलत दी मति मेरी भीम की गदा ने और
पार्थ के शरासन ने, अपनी कृपान ने;
और जब अर्जुन को मोह हुआ रण-बीच,
बुझती शिखा में दिया घृत भगवान ने;
सबकी सुबुद्धि पितामह, हाय, मारी गयी,
सबको विनष्ट किया एक अभिमान ने।
“कृष्ण कहते हैं, युद्ध अनघ है, किन्तु मेरे
प्राण जलते हैं पल-पल परिताप से;
लगता मुझे है, क्यों मनुष्य बच पाता नहीं
दह्यमान इस पुराचीन अभिशाप से?
और महाभारत की बात क्या? गिराये गये
जहाँ छल-छद्म से वरण्य वीर आप-से,
अभिमन्यु-वध औ’ सुयोधन का वध हाय,
हममें बचा है यहाँ कौन, किस पाप से?
“एक ओर सत्यमयी गीता भगवान की है,
एक ओर जीवन की विरति प्रबुद्ध है;
जनता हूँ, लड़ना पड़ा था हो विवश, किन्तु,
लहू-सनी जीत मुझे दीखती अशुद्ध है;
ध्वंसजन्य सुख याकि सश्रु दुख शान्तिजन्य,
ग्यात नहीं, कौन बात नीति के विरुद्ध है;
जानता नहीं मैं कुरुक्षेत्र में खिला है पुण्य,
या महान पाप यहाँ फूटा बन युद्ध है।
“सुलभ हुआ है जो किरीट कुरुवंशियों का,
उसमें प्रचण्ड कोई दाहक अनल है;
अभिषेक से क्या पाप मन का धुलेगा कभी?
पापियों के हित तीर्थ-वारि हलाहल है;
विजय कराल नागिनी-सी डँसती है मुझे,
इससे न जूझने को मेरे पास बल है;
ग्रहन करूँ मैं कैसे? बार-बार सोचता हूँ,
राजसुख लोहू-भरी कीच का कमल है।
“बालहीना माता की पुकार कभी आती, और
आता कभी आर्त्तनाद पितृहीन बाल का;
आँख पड़ती है जहाँ, हाय, वहीं देखता हूँ
सेंदुर पुँछा हुआ सुहागिनी के भाल का;
बाहर से भाग कक्ष में जो छिपता हूँ कभी,
तो भी सुनता हूँ अट्टहास क्रूर काल का;
और सोते-जागते मैं चौंक उठता हूँ, मानो
शोणित पुकारता हो अर्जुन के लाल का।
“जिस दिन समर की अग्नि बुझ शान्त हुई,
एक आग तब से ही जलती है मन में;
हाय, पितामह, किसी भाँति नहीं देखता हूँ
मुँह दिखलाने योग्य निज को भुवन मे
ऐसा लगता है, लोग देखते घृणा से मुझे,
धिक् सुनता हूँ अपने पै कण-कण में;
मानव को देख आँखे आप झुक जातीं, मन
चाहता अकेला कहीं भाग जाऊँ वन में।
“करूँ आत्मघात तो कलंक और घोर होगा,
नगर को छोड़ अतएव, वन जाऊँगा;
पशु-खग भी न देख पायें जहाँ, छिप किसी
कन्दरा में बैठ अश्रु खुलके बहाऊँगा;
जानता हूँ, पाप न धुलेगा वनवास से भी,
छिप तो रहुँगा, दुःख कुछ तो भुलऊँगा;
व्यंग से बिंधेगा वहाँ जर्जर हृदय तो नहीं,
वन में कहीं तो धर्मराज न कहाऊँगा।”
और तब चुप हो रहे कौन्तेय,
संयमित करके किसी विध शोक दुष्परिमेय
उस जलद-सा एक पारावार
हो भरा जिसमें लबालब, किन्तु, जो लाचार
बरस तो सकता नहीं, रहता मगर बेचैन है।
भीष्म ने देखा गगन की ओर
मापते, मानो, युधिष्ठिर के हृदय का छोर;
और बोले, ‘हाय नर के भाग !
क्या कभी तू भी तिमिर के पार
उस महत् आदर्श के जग में सकेगा जाग,
एक नर के प्राण में जो हो उठा साकार है
आज दुख से, खेद से, निर्वेद के आघात से?’
औ’ युधिष्ठिर से कहा, “तूफान देखा है कभी?
किस तरह आता प्रलय का नाद वह करता हुआ,
काल-सा वन में द्रुमों को तोड़ता-झकझोरता,
और मूलोच्छेद कर भू पर सुलाता क्रोध से
उन सहस्रों पादपों को जो कि क्षीणाधार हैं?
रुग्ण शाखाएँ द्रुमों की हरहरा कर टूटतीं,
टूट गिरते गिरते शावकों के साथ नीड़ विहंग के;
अंग भर जाते वनानी के निहत तरु, गुल्म से,
छिन्न फूलों के दलों से, पक्षियों की देह से।
पर शिराएँ जिस महीरुह की अतल में हैं गड़ी,
वह नहीं भयभीत होता क्रूर झंझावात से।
सीस पर बहता हुआ तूफान जाता है चला,
नोचता कुछ पत्र या कुछ डालियों को तोड़ता।
किन्तु, इसके बाद जो कुछ शेष रह जाता, उसे,
(वन-विभव के क्षय, वनानी के करुण वैधव्य को)
देखता जीवित महीरुह शोक से, निर्वेद से,
क्लान्त पत्रों को झुकाये, स्तब्ध, मौनाकाश में,
सोचता, ‘है भेजती हुमको प्रकृति तूफ़ान क्यों?’
पर नहीं यह ज्ञात, उस जड़ वृक्ष को,
प्रकृति भी तो है अधीन विमर्ष के।
यह प्रभंजन शस्त्र है उसका नहीं;
किन्तु, है आवेगमय विस्फोट उसके प्राण का,
जो जमा होता प्रचंड निदाघ से,
फूटना जिसका सहज अनिवार्य है।
यों ही, नरों में भी विकारों की शिखाएँ आग-सी
एक से मिल एक जलती हैं प्रचण्डावेग से,
तप्त होता क्षुद्र अन्तर्व्योम पहले व्यक्ति का,
और तब उठता धधक समुदाय का आकाश भी
क्षोभ से, दाहक घृणा से, गरल, ईर्ष्या, द्वेष से।
भट्ठियाँ इस भाँति जब तैयार होती हैं, तभी
युद्ध का ज्वालामुखी है फूटता
राजनैतिक उलझनों के ब्याज से
या कि देशप्रेम का अवलम्ब ले।
किन्तु, सबके मूल में रहता हलाहल है वही,
फैलता है जो घृणा से, स्वर्थमय विद्वेष से।
युद्ध को पहचानते सब लोग हैं,
जानते हैं, युद्ध का परिणाम अन्तिम ध्वंस है!
सत्य ही तो, कोटि का वध पाँच के सुख के लिए!
किन्तु, मत समझो कि इस कुरुक्षेत्र में
पाँच के सुख ही सदैव प्रधान थे;
युद्ध में मारे हुओं के सामने
पाँच के सुख-दुख नहीं उद्देश्य केवल मात्र थे!
और भी ठे भाव उनके हृदय में, स्वार्थ के, नरता, कि जलते शौर्य के;
खींच कर जिसने उन्हें आगे किया, हेतु उस आवेश का था और भी।
युद्ध का उन्माद संक्रमशील है, एक चिनगारी कहीं जागी अगर,
तुरत बह उठते पवन उनचास हैं, दौड़ती, हँसती, उबलती आग चारों ओर से।
और तब रहता कहाँ अवकाश है तत्त्वचिन्तन का, गंभीर विचार का?
युद्ध की लपटें चुनौती भेजतीं प्राणमय नर में छिपे शार्दूल को।
युद्ध की ललकार सुन प्रतिशोध से दीप्त हो अभिमान उठता बोल है;
चाहता नस तोड़कर बहना लहू, आ स्वयं तलवार जाती हाथ में।
रुग्ण होना चाहता कोई नहीं, रोग लेकिन आ गया जब पास हो,
तिक्त ओषधि के सिवा उपचार क्या? शमित होगा वह नहीं मिष्टान्न से।
है मृषा तेरे हृदय की जल्पना, युद्ध करना पुण्य या दुष्पाप है;
क्योंकि कोई कर्म है ऐसा नहीं, जो स्वयं ही पुण्य हो या पाप हो।
सत्य ही भगवान ने उस दिन कहा, ‘मुख्य है कर्त्ता-हृदय की भावना,
मुख्य है यह भाव, जीवन-युद्ध में भिन्न हम कितना रहे निज कर्म से।’
औ’ समर तो और भी अपवाद है, चाहता कोई नहीं इसको मगर,
जूझना पड़ता सभी को, शत्रु जब आ गया हो द्वार पर ललकारता।
है बहुत देखा-सुना मैंने मगर, भेद खुल पाया न धर्माधर्म का,
आज तक ऐसा कि रेखा खींच कर बाँट दूँ मैं पुण्य औ’ पाप को।
जानता हूँ किन्तु, जीने के लिए चाहिए अंगार-जैसी वीरता,
पाप हो सकता नहीं वह युद्ध है, जो खड़ा होता ज्वलित प्रतिशोध पर।
छीनता हो सत्व कोई, और तू त्याग-तप के काम ले यह पाप है।
पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे बढ रहा तेरी तरफ जो हाथ हो।
बद्ध, विदलित और साधनहीन को है उचित अवलम्ब अपनी आह का;
गिड़गिड़ाकर किन्तु, माँगे भीख क्यों वह पुरुष, जिसकी भुजा में शक्ति हो?
युद्ध को तुम निन्द्य कहते हो, मगर, जब तलक हैं उठ रहीं चिनगारियाँ
भिन्न स्वर्थों के कुलिश-संघर्ष की, युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है।
और जो अनिवार्य है, उसके लिए खिन्न या परितप्त होना व्यर्थ है।
तू नहीं लड़ता, न लड़ता, आग यह फूटती निश्चय किसी भी व्याज से।
पाण्डवों के भिक्षु होने से कभी रुक न सकता था सहज विस्फोट यह
ध्वंस से सिर मारने को थे तुले ग्रह-उपग्रह क्रुद्ध चारों ओर के।
धर्म का है एक और रहस्य भी, अब छिपाऊँ क्यों भविष्यत् से उसे?
दो दिनों तक मैं मरण के भाल पर हूँ खड़ा, पर जा रहा हूँ विश्व से।
व्यक्ति का है धर्म तप, करुणा, क्षमा, व्यक्ति की शोभा विनय भी, त्याग भी,
किन्तु, उठता प्रश्न जब समुदाय का, भूलना पड़ता हमें तप-त्याग को।
जो अखिल कल्याणमय है व्यक्ति तेरे प्राण में,
कौरवों के नाश पर है रो रहा केवल वही।
किन्तु, उसके पास ही समुदायगत जो भाव हैं,
पूछ उनसे, क्या महाभारत नहीं अनिवार्य था?
हारकर धन-धाम पाण्डव भिक्षु बन जब चल दिये,
पूछ, तब कैसा लगा यह कृत्य उस समुदाय को,
जो अनय का था विरोधी, पाण्डवों का मित्र था।
और जब तूने उलझ कर व्यक्ति के सद्धर्म में
क्लीव-सा देखा किया लज्जा-हरण निज नारि का,
(द्रौपदी के साथ ही लज्जा हरी थी जा रही
उस बड़े समुदाय की, जो पाण्डवों के साथ था)
और तूने कुछ नहीं उपचार था उस दिन किया;
सो बता क्या पुण्य था? य पुण्यमय था क्रोध वह,
जल उठा था आग-सा जो लोचनों में भीम के?
कायरों-सी बात कर मुझको जला मत; आज तक
है रहा आदर्श मेरा वीरता, बलिदान ही;
जाति-मन्दिर में जलाकर शूरता की आरती,
जा रहा हूँ विश्व से चढ युद्ध के ही यान पर।
त्याग, तप, भिक्षा? बहुत हूँ जानता मैं भी, मगर,
त्याग, तप, भिक्षा, विरागी योगियों के धर्म हैं;
याकि उसकी नीति, जिसके हाथ में शायक नहीं;
या मृषा पाषण्ड यह उस कापुरुष बलहीन का,
जो सदा भयभीत रहता युद्ध से यह सोचकर
ग्लानिमय जीवन बहुत अच्छा, मरण अच्छा नहीं
त्याग, तप, करुणा, क्षमा से भींग कर,व्यक्ति का मन तो बली होता, मगर,
हिंस्र पशु जब घेर लेते हैं उसे, काम आता है बलिष्ठ शरीर ही।
और तू कहता मनोबल है जिसे,शस्त्र हो सकता नहीं वह देह का;
क्षेत्र उसका वह मनोमय भूमि है,नर जहाँ लड़ता ज्वलन्त विकार से।
कौन केवल आत्मबल से जूझ करजीत सकता देह का संग्राम है?
पाश्विकता खड्ग जब लेती उठा,आत्मबल का एक बस चलता नहीं।
जो निरामय शक्ति है तप, त्याग में,व्यक्ति का ही मन उसे है मानता;
योगियों की शक्ति से संसार में,हारता लेकिन, नहीं समुदाय है।
कानन में देख अस्थि-पुंज मुनिपुंगवों का
दैत्य-वध का था किया प्रण जब राम ने;
“मातिभ्रष्ट मानवों के शोध का उपाय एक
शस्त्र ही है?” पूछा था कोमलमना वाम ने।
नहीं प्रिये, सुधर मनुष्य सकता है तप,
त्याग से भी,” उत्तर दिया था घनश्याम ने,
“तप का परन्तु, वश चलता नहीं सदैव
पतित समूह की कुवृत्तियों के सामने।”





तृतीय सर्ग
समर निंद्य है धर्मराज, पर,कहो, शान्ति वह क्या है,
जो अनीति पर स्थित होकर भी बनी हुई सरला है?
सुख-समृद्धि क विपुल कोषसंचित कर कल, बल, छल से,
किसी क्षुधित क ग्रास छीन, धन लूट किसी निर्बल से।
सब समेट, प्रहरी बिठला कर कहती कुछ मत बोलो,
शान्ति-सुधा बह रही, न इसमें गरल क्रान्ति का घोलो।
हिलो-डुलो मत, हृदय-रक्त अपना मुझको पीने दो,
अचल रहे साम्रज्य शान्ति का, जियो और जीने दो।
सच है, सत्ता सिमट-सिमट जिनके हाथों में आयी,
शान्तिभक्त वे साधु पुरुष क्यों चाहें कभी लड़ाई?
सुख का सम्यक्-रूप विभाजन जहाँ नीति से, नय से
संभव नहीं; अशान्ति दबी हो जहाँ खड्ग के भय से,
जहाँ पालते हों अनीति-पद्धति को सत्ताधारी,
जहाँ सुत्रधर हों समाज के अन्यायी, अविचारी;
नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धि के जहाँ न आदर पायें;
जहाँ सत्य कहनेवालों के सीस उतारे जायें;
जहाँ खड्ग-बल एकमात्र आधार बने शासन का;
दबे क्रोध से भभक रहा हो हृदय जहाँ जन-जन का;
सहते-सहते अनय जहाँ मर रहा मनुज का मन हो;
समझ कापुरुष अपने को धिक्कार रहा जन-जन हो;
अहंकार के साथ घृणा का जहाँ द्वन्द्व हो जारी;
ऊपर शान्ति, तलातल में हो छिटक रही चिनगारी;
आगामी विस्फोट काल के मुख पर दमक रहा हो;
इंगित में अंगार विवश भावों के चमक रहा हो;
पढ कर भी संकेत सजग हों किन्तु, न सत्ताधारी;
दुर्मति और अनल में दें आहुतियाँ बारी-बारी;
कभी नये शोषण से, कभी उपेक्षा, कभी दमन से,
अपमानों से कभी, कभी शर-वेधक व्यंग्य-वचन से।
दबे हुए आवेग वहाँ यदि उबल किसी दिन फूटें,
संयम छोड़, काल बन मानव अन्यायी पर टूटें;
कहो, कौन दायी होगा उस दारुण जगद्दहन का
अहंकार य घृणा? कौन दोषी होगा उस रण का?

तुम विषण्ण हो समझ हुआ जगदाह तुम्हारे कर से।
सोचो तो, क्या अग्नि समर की बरसी थी अम्बर से?
अथवा अकस्मात् मिट्टी से फूटी थी यह ज्वाला?
या मंत्रों के बल जनमी थी यह शिखा कराला?
कुरुक्षेत्र के पुर्व नहीं क्या समर लगा था चलने?
प्रतिहिंसा का दीप भयानक हृदय-हृदय में बलने?
शान्ति खोलकर खड्ग क्रान्ति का जब वर्जन करती है,
तभी जान लो, किसी समर का वह सर्जन करती है।
शान्ति नहीं तब तक, जब तक सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को अधिक हो, नहीं किसी को कम हो।
ऐसी शान्ति राज्य करती है तन पर नहीं, हृदय पर,
नर के ऊँचे विश्वासों पर,श्रद्धा, भक्ति, प्रणय पर।
न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है,जबतक न्याय न आता,
जैसा भी हो, महल शान्ति का सुदृढ नहीं रह पाता।
कृत्रिम शान्ति सशंक आप अपने से ही डरती है,
खड्ग छोड़ विश्वास किसी का कभी नहीं करती है।
और जिन्हेँ इस शान्ति-व्यवस्था में सिख-भोग सुलभ है,
उनके लिए शान्ति ही जीवन-सार, सिद्धि दुर्लभ है।
पर, जिनकी अस्थियाँ चबाकर,शोणित पीकर तन का,
जीती है यह शान्ति, दाह समझो कुछ उनके मन का।
सत्व माँगने से न मिले,संघात पाप हो जायें,
बोलो धर्मराज, शोषित वे जियें या कि मिट जायें?

न्यायोचित अधिकार माँगने से न मिलें, तो लड़ के,
तेजस्वी छीनते समर को जीत, या कि खुद मरके।
किसने कहा, पाप है समुचित सत्व-प्राप्ति-हित लड़ना ?
उठा न्याय क खड्ग समर में अभय मारना-मरना ?
क्षमा, दया, तप, तेज, मनोबल की दे वृथा दुहाई,
धर्मराज, व्यंजित करते तुम मानव की कदराई।
हिंसा का आघात तपस्या ने कब, कहाँ सहा है ?
देवों का दल सदा दानवों से हारता रहा है।
मनःशक्ति प्यारी थी तुमको यदि पौरुष ज्वलन से,
लोभ किया क्यों भरत-राज्य का? फिर आये क्यों वन से?
पिया भीम ने विष, लाक्षागृह जला, हुए वनवासी,
केशकर्षिता प्रिया सभा-सम्मुख कहलायी दासी
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, सबका लिया सहारा;
पर नर-व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुए विनत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है,
पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो।
उसको क्या, जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ?
तीन दिवस तक पन्थ माँगते रघुपति सिन्धु-किनारे,
बैठे पढते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से,
उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर ‘त्राहि-त्राहि’ करता आ गिरा शरण में,
चरण पूज, दासता ग्रहण की,बँधा मूढ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की,
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
जहाँ नहीं सामर्थ्य शोध की, क्षमा वहाँ निष्फल है।
गरल-घूँट पी जाने का मिस है, वाणी का छल है।
फलक क्षमा का ओढ छिपाते जो अपनी कायरता,
वे क्या जानें ज्वलित-प्राण नर की पौरुष-निर्भरता ?
वे क्या जानें नर में वह क्या असहनशील अनल है,
जो लगते ही स्पर्श हृदय से सिर तक उठता बल है?
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Wednesday, 7 October 2015

अकाल और उसके बाद






कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।



दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।
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राम की शक्ति पूजा


सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

रवि हुआ अस्त
ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद कौशल समूह
राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध-कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि-राजीवनयन- हतलक्ष्य-बाण,
लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान,
राघव-लाघव- रावण-वारण – गत- युग्म-प्रहर,
उद्धत-लंकापति मर्दित-कपि-दल-बल- विस्तर,
अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भंग-भाव,
विद्धांग-बद्ध- कोदण्डमुष्टि खर-रुधिर-स्राव,
रावण-प्रहार-दुर्वार-विकल वानर- दल-बल,
मुर्छित-सुग्रीवांगद-भीषण-गवाक्ष-गय-नल,
वारित-सौमित्र – भल्लपति-अगणित-मल्ल-रोध,
गर्ज्जित-प्रलयाब्धि-क्षुब्ध हनुमत्-केवल प्रबोध,
उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत-कपि चतुःप्रहर,
जानकी-भीरू-उर – आशा भर-रावण सम्वर।



लौटे युग-दल-राक्षस – पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार – बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।

प्रशमित हैं वातावरण, नमित-मुख सान्ध्य कमल
लक्ष्मण चिन्तापल पीछे वानर वीर-सकल
रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,
श्लथ धनु-गुण है, कटिबन्ध स्रस्त तूणीर-धरण,
दृढ़ जटा – मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वृक्ष पर, विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार
चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार।

आये सब शिविर,सानु पर पर्वत के, मन्थर
सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर
सेनापति दल – विशेष के, अंगद, हनुमान
नल नील गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान
करने के लिए, फेर वानर दल आश्रय स्थल।

बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल
ले आये कर – पद क्षालनार्थ पटु हनुमान
अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या – विधान
वन्दना ईश की करने को, लौटे सत्वर,
सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर,
पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर,
सुग्रीव, प्रान्त पर पाद-पद्म के महावीर,
यूथपति अन्य जो, यथास्थान हो निर्निमेष
देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश।

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार,
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर – फिर संशय
रह – रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय,
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त,
एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त,
कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार – बार,
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत
देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
विदेह का, -प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
नयनों का-नयनों से गोपन-प्रिय सम्भाषण,-
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,-
काँपते हुए किसलय,-झरते पराग-समुदय,-
गाते खग-नव-जीवन-परिचय-तरू मलय-वलय,-
ज्योतिःप्रपात स्वर्गीय,-ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,-
जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त,
हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,
फूटी स्मिति सीता ध्यान-लीन राम के अधर,
फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर,
वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,-
फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,
देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,
ताड़का, सुबाहु, बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर;

फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो
आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को,
ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण,
पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन;
लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन,
खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;
फिर सुना हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,
भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्तादल।

बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द-
युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक रूप, गुण-गण-अनिन्द्य;
साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिणपद,
दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद् गद्
पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम – धाम,
जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम – नाम।
युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल,
देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल;
ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,-
सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ;
टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल,
सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल
बैठे वे वहीं कमल-लोचन, पर सजल नयन,
व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख निश्चेतन।
“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार,
उद्वेल हो उठा शक्ति – खेल – सागर अपार,
हो श्वसित पवन – उनचास, पिता पक्ष से तुमुल
एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल,
शत घूर्णावर्त, तरंग – भंग, उठते पहाड़,
जल राशि – राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़,
तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष,
शत-वायु-वेग-बल, डूबा अतल में देश – भाव,
जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव
वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश
पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।
रावण – महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार,
यह रूद्र राम – पूजन – प्रताप तेजः प्रसार;
उस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कन्ध-पूजित,
इस ओर रूद्र-वन्दन जो रघुनन्दन – कूजित,
करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,
लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण-भर चंचल,
श्यामा के पद तल भार धरण हर मन्द्रस्वर
बोले- “सम्बरो, देवि, निज तेज, नहीं वानर
यह, -नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर,
अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय – शरीर,
चिर – ब्रह्मचर्य – रत, ये एकादश रूद्र धन्य,
मर्यादा – पुरूषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य,
लीलासहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार
करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार;
विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,
झुक जायेगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।”

कह हुए मौन शिव, पतन तनय में भर विस्मय
सहसा नभ से अंजनारूप का हुआ उदय।
बोली माता “तुमने रवि को जब लिया निगल
तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल,
यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह रह।
यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह सह।
यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल,
पूजते जिन्हें श्रीराम उसे ग्रसने को चल
क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ? सोचो मन में,
क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रधुनन्दन ने?
तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य,
क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?”
कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन,
उतरे धीरे धीरे गह प्रभुपद हुए दीन।

राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण,
“हे सखा” विभीषण बोले “आज प्रसन्न वदन
वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर वानर
भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर,
रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित,
है वही वक्ष, रणकुशल हस्त, बल वही अमित,
हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनादजित् रण,
हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन,
ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,
अप्रतिभट वही एक अर्बुद सम महावीर
हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर,
फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव प्रहर।
रघुकुलगौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण।

कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलनसमय,
तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय!
रावण? रावण लम्पट, खल कल्म्ष गताचार,
जिसने हित कहते किया मुझे पादप्रहार,
बैठा उपवन में देगा दुख सीता को फिर,
कहता रण की जय-कथा पारिषद-दल से घिर,
सुनता वसन्त में उपवन में कल-कूजित पिक
मैं बना किन्तु लंकापति, धिक राघव, धिक्-धिक्?




सब सभा रही निस्तब्ध
राम के स्तिमित नयन
छोड़ते हुए शीतल प्रकाश देखते विमन,
जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव
उससे न इन्हें कुछ चाव, न कोई दुराव,
ज्यों हों वे शब्दमात्र मैत्री की समनुरक्ति,
पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति।

कुछ क्षण तक रहकर मौन सहजनिज कोमलस्वर,
बोले रघुमणि-“मित्रवर, विजय होगी न समर,
यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,
उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण,
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।” कहते छल छल
हो गये नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल,
रुक गया कण्ठ, चमका लक्ष्मण तेजः प्रचण्ड
धँस गया धरा में कपि गह युगपद, मसक दण्ड
स्थिर जाम्बवान, समझते हुए ज्यों सकल भाव,
व्याकुल सुग्रीव, हुआ उर में ज्यों विषम घाव,
निश्चित सा करते हुए विभीषण कार्यक्रम
मौन में रहा यों स्पन्दित वातावरण विषम।
निज सहज रूप में संयत हो जानकी-प्राण
बोले-“आया न समझ में यह दैवी विधान।
रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर,
यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!
करता मैं योजित बार-बार शर-निकर निशित,
हो सकती जिनसे यह संसृति सम्पूर्ण विजित,
जो तेजः पुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार,
हैं जिसमें निहित पतन घातक संस्कृति अपार।

शत-शुद्धि-बोध, सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक,
जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में, श्रीहत खण्डित!
देखा हैं महाशक्ति रावण को लिये अंक,
लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक,
हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार,
निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार।
विचलित लख कपिदल क्रुद्ध, युद्ध को मैं ज्योंज्यों,
झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों-त्यों,
पश्चात्, देखने लगीं मुझे बँध गये हस्त,
फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं, हुआ त्रस्त!”

कह हुए भानुकुलभूष्ण वहाँ मौन क्षण भर,
बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान-“रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन!
तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक,
मध्य भाग में अंगद, दक्षिण-श्वेत सहायक।
मैं, भल्ल सैन्य, हैं वाम पार्श्व में हनुमान,
नल, नील और छोटे कपिगण, उनके प्रधान।
सुग्रीव, विभीषण, अन्य यथुपति यथासमय
आयेंगे रक्षा हेतु जहाँ भी होगा भय।”

खिल गयी सभा। “उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!”
कह दिया वृद्ध को मान राम ने झुका माथ।
हो गये ध्यान में लीन पुनः करते विचार,
देखते सकल-तन पुलकित होता बार-बार।
कुछ समय अनन्तर इन्दीवर निन्दित लोचन
खुल गये, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन,
बोले आवेग रहित स्वर सें विश्वास स्थित
“मातः, दशभुजा, विश्वज्योति; मैं हूँ आश्रित;
हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित;
जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्जित!
यह, यह मेरा प्रतीक मातः समझा इंगित,
मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनन्दित।”

कुछ समय तक स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न,
फिर खोले पलक कमल ज्योतिर्दल ध्यान-लग्न।
हैं देख रहे मन्त्री, सेनापति, वीरासन
बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन।
बोले भावस्थ चन्द्रमुख निन्दित रामचन्द्र,
प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर मेघमन्द्र,
“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर
शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर,
पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द विन्दु,
गरजता चरण प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु।

दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर,
लख महाभाव मंगल पदतल धँस रहा गर्व,
मानव के मन का असुर मन्द हो रहा खर्व।”
फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए
बोले प्रियतर स्वर सें अन्तर सींचते हुए,
“चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इन्दीवर,
कम से कम, अधिक और हों, अधिक और सुन्दर,
जाओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर
तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।”
अवगत हो जाम्बवान से पथ, दूरत्व, स्थान,
प्रभुपद रज सिर धर चले हर्ष भर हनुमान।
राघव ने विदा किया सबको जानकर समय,
सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय।
निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथम किरण
फूटी रघुनन्दन के दृग महिमा ज्योति हिरण।

हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध
वह नहीं सोहता निविड़-जटा-दृढ़-मुकुट-बन्ध,
सुन पड़ता सिंहनाद,-रण कोलाहल अपार,
उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार,
पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम,
बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण
गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।

क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,
चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस,
कर-जप पूरा कर एक चढाते इन्दीवर,
निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।
चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित-मन,
प्रतिजप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण,
संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर,
जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अम्बर।
दो दिन निःस्पन्द एक आसन पर रहे राम,
अर्पित करते इन्दीवर जपते हुए नाम।
आठवाँ दिवस मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर
कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर,
हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध,
हो गये दग्ध जीवन के तप के समारब्ध।
रह गया एक इन्दीवर, मन देखता पार
प्रायः करने हुआ दुर्ग जो सहस्रार,
द्विप्रहर, रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर
हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इन्दीवर।

यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल।
कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,
ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल।
देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,
“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,
बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।

“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।
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